Sunday, 21 October 2018

मोकळा जीव. . .


मोकळ्या श्वासांपरी जरी मोकळा तो जीव हा
मोकळ्या श्र्वासांमध्येही, लडखडे तो जीव हा. . .

मोकळ्या शब्दांतही, अडखळे तो जीव हा
मोकळ्या बंधनातही, धडपडे तो जीव हा. .

मोकळ्या भावनांतही, गुंततो तो जीव हा
मोकळ्या स्पर्शातही, अवघडे तो जीव हा. . .

मोकळ्याश्या या जगात, बंधतो तो जीव हा
मखमली वाटांवरीही, काट्यात रुततो जीव हा. . .

मोकळ्या श्वासांपरी जरी मोकळा तो जीव हा
मोकळ्या श्र्वासांमध्येही, लडखडे तो जीव हा. . .



धन्यवाद!

प्राची खैरनार.

Copyright © Prachi Khairnar.

Tuesday, 25 September 2018

सिगरेट

सिगरेट पिनेकी आदत नहीं मुझे
फिर भी गलेमे खराशें है एक अरसे से  
ज़िन्दगी. .  तेरे कश कुछ ज्यादा ही लगा लिए शायद 

धुवां धुवां सी है अब तू
जैसे कोहरे में ले जा रही कही
कुछ कश तूने फेकें मुझपे
कुछ ग़म मैं फूँक रही हूँ कही

है कुछ ऐसा कश मैं लगाती हूँ जलती मगर तू है
दर्द मैं निगलती हूँ कतरा कतरा ख़त्म होती मगर तू है
हर एक कश के बाद जो हलके से झटक दू तुझको तो
दो चार जलते अरमान ख़ाक हो ही जाते है
अरमान ही तो थे यहाँ तो ऐ ज़िन्दगी तेरे साथ मेरे लम्हें भी तो जल रहे है

हर एक लम्हा, हर एक अरमान धुवां हो गया कही
कोहरे में ढूंढ रही हूँ उन्हें, के इस उम्मीद में
कही कोइ बन के ओस बैठा हो मेरे इंतज़ार में
के मैं आऊं और समा लू फिर से उसे अपने आप में


धन्यवाद!

प्राची खैरनार.


Copyright © Prachi Khairnar.


Monday, 10 September 2018

मैं भी कुछ हूं

उन तमाम महिलाओं के लिए जो कही न कही आज भी लड़ रही है अपना अस्तित्व, अपना वजूद ढूंढने के लिए, अपने सपनों को जीने के लिए.

के मैं भी कुछ हूं, ये मुझे खुद को है याद दिलाना
खुदसे जो वादे किये है अनगिनत, उन्हें मुझे ही है निभाना

पर शायद मन में कुछ ठहराव सा है
बरसों चली आ रही परम्पराओंका, कुछ बोझ सा है
आजभी कही कोई खिचाव सा है
उस कंगन, पायल या बिंदी के घेराव में बसी एक ज़िन्दगी का  है
मेरे औरत होने के दायरों का, लकीरों का है

एक माँ, एक बेहेन, एक पत्नी का धर्म तो निभाना है लेकिन
मेरे औरत होने के धर्मको निभाना अभी बाकी है
मेरे खुद के होने के एहसास को पहचानना अभी बाकी है
खुद से किये हुए वादों को जानना अभी बाकी है.

कुछ है ऐसा, जिसका संघर्ष अभी बाकी है
एक माँ, एक बहन और हर उस औरत को
ये एहसास दिलाना जरूरी है
के तू भी कुछ है, ये तूने खुदने मानना जरूरी है

तभी शायद कंधे से कन्धा मिलाने का असली मतलब तू समझ पाए
और अपने आपमें बसी उस औरत को और  हर उस इंसान को ये जता पाए
के तू भी कुछ है. . हाँ, तू भी कुछ है



शुक्रिया. .

प्राची खैरनार.



Copyright © Prachi Khairnar.

Thursday, 23 August 2018

कैदी "मैं"



क्यों ना "मैं" ही से शुरुआत करें,
क्यों ना "मैं" ही को खोजें पहले
जो तू कह रहा है के खो गया है कही इस भीड़ में. . .

ये "मैं" कौन है? आखिर दिखता कैसा है?
क्या वो शक्ल सूरत में बिलकुल तेरे जैसा है?
शक्ल सूरत है भी उसकी या नहीं
या फिर दिखाता तू जैसे, ये दिखता वैसा ही है

क्या इस "मैं" को नाम पहचान भी है कोई
या फिर जिस नाम से मिलाता है तू सबको बस ये वही है?
ये "मैं" जो तू केह रहा है की वो भीड़ में खो गया है कही,
मुझे तो शक है, के तूने ही उसे कही कैद कर रखा है

एक ऐसी जगह जहासे दूर दूर तक किसी की आवाज़ ना सुनाई दे
दरवाज़ा लाख खोलना चाहे कोई, तालें की चाबी तक तू उसे पोहोचनें ना दे

के इस "मैं" को तुझे छुड़ाना ही होगा
वो "मैं" जो एक आज़ाद पंछी की तरह उड़ना चाहता है
वो "मैं" जो दायरे के बाहर जाकर कुछ सोचना चाहता है
वो "मैं" जो तेरे ख़्वाबों पर आज भी यकीन करता है

उस "मैं" से तुझे मिलना ही होगा,
भीड़ में जो जी रहा है तू अपनी जिंदगी
उसमें खो कर तुझे "मैं" को पाना ही होगा

उस "मैं" से गर मिल पाया तू, तो ज़िन्दगी जिया तू
न मिल पाया गर उस "मैं" से कभी, तो क्या जिंदगी जिया तू. . .


शुक्रिया. .

प्राची खैरनार.





Copyright © Prachi Khairnar.






Saturday, 18 August 2018

कश्ती

नमश्कार दोस्तों!! दोस्तों, हम सभी ने बचपन में कागज़ की कश्ती बनाके तालाब में, बारिश के पानी से बने छोटे से गड्ढे में,  नदी, झरनों में या समंदर में छोड़ी तो जरुर होगी. बस्स, मैंने भी ऐसी ही एक कश्ती छोड़ी थी समंदर में, अब वो कश्ती लौट आयी है, बड़ी हो गयी है वो कुछ अलग सी भी लग रही है यूँ माने तो जैसे कई layers चढ़े हो उसके ऊपर. पर उसने मुझे और मैंने उसे पहचान लिया है. उससे एक अरसे बाद हुई मुलाक़ात बयाँ कर रही हूँ.


जाने कौन दिशा हो कर आयी है
ना जाने कितने देश घूम आयी है
वो जो छोड़ दी थी कभी नाम पता लिख के
मेरी ये कश्ती एक अरसे बाद लौट आई है

पहले से थोड़ी अलग लग रही है अब और बड़ी भी
कुछ जंग सा चढ गया है मगर, शायद ऐसे कुछ मौसमों से वो गुजर आयी है
कही कोई खरोच के निशाँ भी है, जैसे किसी से बचते बचाते वो निकल आयी है
जितनी उजली हुई उतनीही कुछ थकी सी लग रही है
तजुर्बों का वजन कुछ भारी हो गया लगता है; ख्वाहिशों और उम्मीदों पर

जाने कौन दिशा हो कर आयी है
लगता है जैसे बहोत कुछ देख आयी है

अब जब हम दोनों फुर्सत से गुफ्तगू कर रहे है इस समंदर के किनारे
चाँद की मद्धम सी रौशनी तलें, जाने कितनी छटाएं झलक रही है बात ही बात में
कुछ कुछ सुलझी हुई सी कुछ कुछ उलझी हुई सी
कुछ खुशनुमा भी कुछ उदास भी

बहोत कुछ ये देख समझ आयी है
उलझनों में भी अजीब सी सुलझन इसने पायी है
जाने कौन दिशा हो कर आयी है
मेरी ये कश्ती एक अरसे बाद लौट आई है


शुक्रिया. .

प्राची खैरनार.





Copyright © Prachi Khairnar.

Tuesday, 14 August 2018

इक छोटासा टुकड़ा आसमान का

नमश्कार दोस्तों, डायरी के पन्ने पलटते समय ये छोटासा टुकड़ा हाथ लग गया आसमान का, जो चुपकेसे तोड़ लिया था कभी. पर समय के साथ so called practical life में कुछ भूल सी गयी थी.  अब जब याद आ गयी है उसकी तो मालूम हो रहा है वो कही छुप कर बैठा है और साथ साथ मेरे ऐसे ही कुछ और साथियों को भी ले चला है. आपको दिख जाए तो इत्तेलाह जरूर कीजियेगा, अब जब खोने का एहसास हुआ है उन्हें तो एहमियत पता चल रही है उनकी. साथ निभाने का वादा जरूर करुँगी अगर मिल जाए ये साथी मेरे.  देखें. . .

इक छोटासा टुकड़ा आसमान का
नजर बचाके सबकी तोड़ लिया था कभी चुपकेसे
पता नहीं कहा छुपकर बैठा है

परेशान इसलिए भी हूँ
के कम्बख़त ने मेरी ख्वाहिशों को भी अपनी टीम में शामिल कर लिया है
और उनको ढूंढते राह चलते पता नहीं
शायद मेरे ख्वाबों ने भी उन्हें जॉइन कर लिया है कही

आपको दिख जाएँ अगर तो नजर रखियेगा जरा
आसमान कुछ हलके भूरे रंगो के कपड़ें पहने हुए है
ख्वाहिशें बड़ी मासूम और नन्ही है मेरी
रंगबिरंगी तितलियों जैसी
ख्वाबों का कद् ऊँचा है मेरे ,
रंगो का तो पता नहीं पर बड़ी सी चादर लपेटें हुए घूमता है
जाने क्या क्या समेटे हुए रहता है.

आपको दिख जाए अगर तो खबर कीजिएगा जरूर
एक छोटासा टुकड़ा है आसमान का
पता नहीं कहा छुप कर बैठा है



शुक्रिया. .


प्राची खैरनार.



Copyright © Prachi Khairnar.

Tuesday, 7 August 2018

कुछ हसीं लम्हें . . . फिर से




बहोत दिनों बाद कुछ हस पड़ा ये दिल है आज
कुछ हसीं लम्हों ने फिर से भर दिया ये दामन है आज

कुछ अनछूएसे तार छेड़ दिए यूँ किसी ने आज
बिखरे से सुरों में मिल रहा अलग सुर है आज

चाँद तो आज भी बादलों से तक रहा है लेकिन
कई अनगिनत सितारों ने भर दिया ये मेरा आँगन है आज

बहोत दिनों बाद कुछ हस पड़ा ये दिल है आज
कुछ हसीं लम्हों को फिर से जी भर के जी लिया है आज

कैसे बयाँ करें खुद से हुई मुलाकात का मज़ा
खुद को खो कर शायद खुद को पा लिया है आज

यूँ तो कई बार खुद से रूठने मनाने के सिलसिले हुए मगर
खुद से ही खुद को जीत लेने के एहसास को जिया है आज

यूँ तोह एहसास एक जज्बा है फिर भी
उसी एहसास को जुबाँ मिल गयी है आज

बहोत दिनों बाद कुछ हस पड़ा ये दिल है आज
कुछ हसीं लम्हों ने फिर से भर दिया ये दामन है आज


धन्यवाद!


प्राची खैरनार.



Copyright © Prachi Khairnar.


Wednesday, 11 May 2016

आठवणींचं पुस्तक. . .



आज असच जरा खण आवरताना कोपऱ्यात पडलेलं एक पुस्तक हाती लागलं आणि ओठांवर नकळतच हसू उमटलं. हे पुस्तक या कोपऱ्यात कसं पडलं !! या विचारांनीच मनात गर्दी केली आणि आठवणींची गलबतं बंदरावरून अलगद सुटली. नकळतच बसलो खुर्चीत, जुन्या आठवणींमध्ये रमत. खोलीचा कोपरा आणि कोपरा बसला जणू  सिनेमा बघायला माझ्यासोबत. आराम खुर्चीच्या प्रत्येक हेलकाव्यसोबत एक एक पान उलटत होतं आणि "ती" इथेच कुठेतरी असल्याची जाणीव घट्ट करत होतं.

पुस्तकाच्या प्रत्येक पानात ती लपली होती,
जणू वाक्याच्या शब्दांवरून फिरलेल्या त्या नाजुक बोटांची ती ग्वाही होती.

तिचं हसणं, तिचं रुसणं, तिचं मनवण,
प्रत्येक पानात तिचीच एक आठवण दडली होती.

हे पुस्तक तसं आम्हा दोघांच्या ही आवडीचं,
पण त्यातली सगळी पात्र तिच्यामुळेच सजीव होती.

अमुक पात्राचं वागणं कसं वाईट, आणि त्यातला नायक किती romantic,
प्रत्येक व्यक्तीवर तिची एक विशेष टिप्पणी होती.

प्रत्येक पानाचा आपला एक वेगळाच किस्सा होता,
आणि प्रत्येक किस्स्यात तिच्या गालावरची खळी होती.

फावल्या वेळातला पानांच्या नंबर्स चा तो खेळ, आणि मी चीटिंग करूनच जिंकलो,
हे भांडून मला पटवून देण्यात जाणारा तिचा तो वेळ.

सगळंच निराळं. . तो गावच खरा निराळा,
हलकेच हसलो खरा, कोणास ठाऊक खिन्नपणे की . . . . . !!

प्रत्येक पानागणिक जीवाची घालमेल वाढत होती,
नको असलेली एक आठवण जवळ येत होती.

शेवटची काही पानं बाकी असताना लगलीच ती गुलाबाची पाकळी माझ्या हाताला,
म्हणाली होती, गुलाबाचं फूल नको तू एवढी पाकळीच ठेव माझ्या आठवणीला.

कारण विचारल्यावर तिची पडलेली ती नजर,
आजही आठवली की नकळतच खाली पडणारी माझी नजर.

आणि अचानक खालून आमच्या "सौ"चा  आवाज आला, अरे ऐकलस का! मिलिंद आलाय तुला भेटायला. . .
शेवटची पानं उलटलीच नाहीत. .  तेव्हाही आणि आजही. . .
बसव त्या पठ्ठ्याला, आलोच मी. पुन्हा एकदा मुखवटा चढला, पुन्हा एकदा पुस्तक मिटलं. . यावेळीस कदाचित कायमचं. . . .




धन्यवाद!


प्राची खैरनार.



Copyright © Prachi Khairnar.







    

Monday, 25 April 2016

मनातले विचार!!!


नमस्कार मंडळी, आज कुठलीही कविता, नज्म, लेख किंवा समीक्षण नाही तर काही सहज मनात आलेले विचार तुमच्या पुढे मांडावेसे वाटतायत. तुम्हाला काय वाटतं हे नक्की कळवा.


शिक्षणाने मोठा झालेला माणूस मनाने आणि डोक्याने मोठा होतोच असं नाही.

                                                          * * * * * * * * * * * *

भारतात जातिवाद हा काही नवीन विषय नाही, आणि कदाचित असलेल्या जाती कमी की काय म्हणून एक नवी जात स्वतःचे  पाय अधिकाधिक घट्ट रोवतेय ती म्हणजे "पैसा". . .

                                                          * * * * * * * * * * * *

आरक्षण हे आपल्याला इतर समाजाबरोबर त्यांच्या बरोबरीने उभं राहण्याकरता होतं, अशात पैसा या जातीने कमकुवत असलेल्या पण सामाजिक स्तरावर कायद्याने आरक्षणास अपात्र असलेल्या जातीने काय करावं ? ?

                                                          * * * * * * * * * * * *

आजही जातिवाद हा एक सत्ताकारणाचाच विषय आहे, किंबहुना त्यासाठीच त्याचा वापर केला जातो आणि तो सतत तेवत ठेवला जातो. नाहीतर सर्व सामान्य जनमानसातला जातिभेद हा नष्ट होण्याच्या मार्गावर आहे अस म्हणायला हरकत नाही. अर्थात तो समूळ नष्ट व्हायला अजून बऱ्याच पिढ्या जाव्या लागतील हेही खरच.

                                                          * * * * * * * * * * * *

शक्य आणि अशक्य यात सत्यता किंवा परिणाम नाही तर आपला दृष्टीकोन लपलाय.

                                                          * * * * * * * * * * * *

काय वाटतं ??





धन्यवाद!

प्राची खैरनार.



Copyright © Prachi Khairnar.


Tuesday, 1 March 2016

गोष्ट तुझी. . . गोष्ट माझी!!!


नमस्कार मंडळी!! आयुष्यात अशा अनेक व्यक्ति येतात, काही आयुष्यभर सोबत राहतात, तर काही मोजक्या क्षणांच्याच सोबती असतात. अगदीच नाही म्हटलं तरीही प्रत्येकाच्या आयुष्यात अशी एखादी तरी व्यक्ति असते जी मनात खोलवर कुठेतरी घर करून बसलेली असते. जिला रोज आठवावं अस काही नसतं पण आलीच आठवण की विसरण्यासारखही काही नसतं.  एक शेर आठवला यावरून  "नहीं आती जब उनकी याद तो बरसों नहीं आती, मगर जब याद आतें है तो अक्सर याद आते है". तर प्रत्येकाच्या आयुष्यात आलेल्या अशा त्या एका व्यक्तिकरता - "गोष्ट तुझी. . . नी गोष्ट माझी" 



गोष्ट तुझी माझी, दडलेल्या अनेक भावनांची
न उलगडलेल्या नात्याची, 
गोष्ट तुझी माझी. . .

आयुष्यभराच्या लपंडावाची,
कधी मी तुला तर कधी तू मला शोधण्याची,
क्षणिकच विसावल्या क्षणांची,
निःशब्द  त्या प्रेमाची,
गोष्ट तुझी माझी. . .

एकमेकांना शोधता शोधता
स्वतः हरवलेल्या जाणिवेची,
नकळतच वळलेल्या पावलांची,
सुरु झालेल्या नव्या लपंडावाची,
गोष्ट तुझी. . .  नी गोष्ट माझी. . .

गवसलास तुला तू की नाही,
या कायम राहिलेल्या गुपिताची,
माझ्या मात्र शोध मोहीमेला अंत नाही,
या ना खेदाची ना खंताची. . .
गोष्ट तुझी. . .  नी गोष्ट माझी. . .

काही गुपितं बंद कुपीतच बरी,
तरी, आजही मनात घर करून राहिलीयेत  खरी,
असो, तर गोष्ट तुझी नी गोष्ट माझी
आणि अबोल अशा कित्येक भावनांची. .

कधीतरी कुठल्याशा वळणावर भेट होईल का आपली?
झालीच चुकून, तर नजरेला नजर भिडेल का आपली?
या आणि अशा असंख्य प्रश्नांची,
कधीच न संपणाऱ्या लपंडावाची,
गोष्ट तुझी. .  की. .  गोष्ट फ़क्त माझी!!!


धन्यवाद!

प्राची खैरनार.



Copyright © Prachi Khairnar.